Sunday, February 7, 2010

अंजू राष्ट्रमंडल खेलों से हटीं


शीर्ष लंबी कूद एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज निजी कारणों से दिल्ली में अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों से हट गई है।अंजू 2008 के बीजिंग ओलंपिक में असफल रहने के बाद बड़ी प्रतियोगिताओं में नहीं दिखाई दी थी। उन्होंने कहा कि वह दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेकर देश के लिए पदक जीतना चाहती थीं। लेकिन निजी कारणों से उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूत होना पड़ा है। वह इसके साथ ही 2010 के पूरे सत्र में किसी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेंगी। लेकिन विश्व की पूर्व चार नम्बर की लंबी कूद एथलीट अंजू ने विश्वास व्यक्त किया कि वह अगले वर्ष के शुरू में ट्रैक पर लौटेंगी।

Monday, October 26, 2009

टेक्नोलॉजी का उपायोग बढ़े : सचिन


सचिन तेंदुलकर ने सलाह दी है कि मैदान अंपायरों को केवल पगबाधा के फैसले देने चाहिए तथा क्रिकेट मैदान के अन्य सभी मसलों पर अंतिम फैसला देने के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाना चाहिए। साथ ही अंपायरों को राहत देने के मकसद से उनका सुझाव है कि टेस्ट मैचों में दो के बजाए तीन मैदानी अंपायर होने चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 29 हजार से ज्यादा रन बनाने वाले तेंदुलकर ने सही फैसले करने और मैदानी अंपायरों पर से दबाव हटाने के लिए हाट स्पाट टेक्नोलॉजी के उपयोग को बढ़ाने की भी वकालत की जिससे गेंद के पहले संपर्क का पता चल जाता है। उन्होंने कहा, विकेट के पीछे के कैच और इस तरह के अन्य कैच के लिए हाट स्पाट उपयोगी साबित होगा। करीबी कैचों में भी हाट स्पाट की मदद मिलेगी। बोल्ड के लिए आपको मशीन की जरूरत नहीं पड़ेगी इसलिए अंपायरों को केवल एलबीडब्ल्यू फैसलों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
तेंदुलकर ने एक मैगजीन से बातचीत में कहा, अंपायरों के लिए नो बाल देखना और फिर आगे क्या हो रहा है यह देखना काफी मुश्किल है। नो बाल पर लाइन के फैसलों के लिए आपके पास लेजर और इसी तरह की तकनीकी होती है। नो बाल के लिए आप मशीन का सहारा नहीं ले सकते। तेंदुलकर हाट स्पाट के परिणाम से काफी प्रभावित हैं और उन्होंने कहा कि इसका उपयोग बल्ले और पैड पर लगने संबंधी फैसलों के लिए किया जा सकता है। उन्होंने कहा, हम अब भी करीबी कैचों के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग कर रहे हैं। उन्हें बैट पैड फैसले के लिए हाट स्पाट का उपयोग करना चाहिए ताकि मुख्य अंपायर केवल एलबीडब्ल्यू का फैसला करें। मैं हाट स्पाट से खुश हूं क्योंकि इससे गेंद के संपर्क का पता चल जाता है।
यह स्टार बल्लेबाज हालांकि अंपायर रेफरल प्रणाली से प्रभावित नहीं दिखे। उन्होंने इसके साथ ही टेस्ट मैचों में दो की बजाय तीन अंपायरों को रखने की वकालत की जिन्हें सत्र दर सत्र ड्यूटी निभानी चाहिए। तेंदुलकर भारत और श्रीलंका के बीच 2008 में खेली गई सीरीज के संदर्भ में कहा, मैं रेफरल से खास खुश नहीं हूं क्योंकि मैं [टेलीविजन पर] कोण से संतुष्ट नहीं था। हम जब पहली बार इससे गुजरे तो उससे खुश नहीं थे। उनका एक अन्य सुझाव यदि गंभीरता से लिया जाता है तो वह अंपायरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर सकता है। तेंदुलकर ने कहा, हमारे पास प्रत्येक सत्र के लिए अंपायर हो सकते हैं और ऐसे में मैच के लिए तीन अंपायर होंगे। ऐसे में अंपायरों को विश्राम का समय मिल जाएगा।

Friday, October 16, 2009


दिवाली की शुभकामनाये

दिवाली मनाये 'ऑल द बेस्ट' के संग

बॉलिवुड में कॉमिडी एक ऐसा सदाबहार और बॉक्स ऑफिस पर हमेशा कमाई वाला सब्जेक्ट माना जाता है , जिसके नाकाम होने की गुजांइश बेहद कम ही रहती है। शायद यहीं वजह है कि यहां अगर प्रियदर्शन या फिर अक्षय कुमार अपने इस ट्रैक से हटकर कुछ नया करने की चाह में अलग करते है तो बॉक्स ऑफिस पर दर्शक इन्हें नकार देते हैं। लगता है , ' यू मी और हम ' जैसी कुछ अलग टेस्ट और फैमिली क्लास फिल्म बना चुके एक्टर से प्रडयूसर बने अजय देवगन को भी बॉलिवुड का यह गणित अब समझ में आ गया होगा। अजय की बतौर निर्माता इस फिल्म में आपको ऐसा हर फॉर्म्युला मिल जाएगा जो निर्माता , वितरकों और सिनेमा मालिकों की तिजोरी भर सकता है। इस फिल्म के डायरेक्टर रोहित अजय के खास और पुराने दोस्तों में हैं। इसी चलते अजय ने जब इस फिल्म को बनाने की प्लनानिंग की तो , उन्हें सबसे पहले उन्हीं की याद आई। दरअसल इससे पहले अजय के साथ 2 सुपर हिट कॉमिडी फिल्में गोलमाल और गोलमाल रिटर्न्स बना चुके थे। इसलिए रोहित जानते थे कि अजय से अच्छी कॉमिडी करवाई जा सकती है। अजय ने जब इस प्रोजेक्ट को फाइनल किया तो जहां फाइनैंस की जिम्मेदारी कुमार मंगत को सौंपी , तो वहीं रोहित को डायरेक्शन की कमान सौंपते हुए कह दिया कि उन्हें जो कुछ भी करना है उसका फैसला वह खुद करें। अजय की यह स्टाइल काम आई और इस बार रोहित ने अपनी पिछली दोनों फिल्मों के मुकाबले ज्यादा मनोरंजक और हंसा - हंसा कर लोटपोट करने वाली फिल्म बनाई। ऐसा नहीं कि रोहित शुरू से आखिरी तक दर्शकों को सीट से बांधे रखने और हंसाने में पूरी तरह कामयाब रहे हों। शुरू के 20 मिनट तक फिल्म में कुछ निरसता दिखेगी , जैसे ही वीर ( फरदीन खान ) के उनके बड़े भाई धर्म कपूर ( संजय दत्त ) की ऐंट्री होती है कि आप फिल्म से बंध जाते हैं। पूरी फिल्म में अजय , फरदीन और संजय की केमिस्ट्री गजब की है। खासकर प्रेम चोपड़ा के रोल में अजय और धर्म कपूर बने संजय दत्त का तो जवाब नहीं। जॉनी लीवर और संजय मिश्रा जिस सीन में भी आए हंसा गए। वहीं बिपाशा और मुग्धा के करने के लिए कुछ खास नहीं था , बस शोपीस बनकर दोनों ने अपनी भूमिका निभा दी। प्रीतम का संगीत सिक्रप्ट पर फिट है। फिल्म का टाइटिल सॉन्ग अच्छा है। हां , इस कॉमिडी के बीच तेज रफ्तार दौड़ती कारों के अलावा गोवा बीच पर अजय , संजय और फरदीन पर फिल्माए फाइट सीन में एक्शन डायरेक्टर जय सिंह ने जान डाल दी है।